कल्कि नगरी संभल का वह काला अध्याय, जब अफसरों पर चलता था सत्ताधारी नेताओं का हुक्म…


उमेश लव लव इंडिया संभल। संभल की करीब 38 बीघा ग्राम समाज की सरकारी भूमि, जिसकी वर्तमान बाजार कीमत 100 करोड़ रुपये से अधिक आंकी जा रही है, आज उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित भूमि घोटालों में शामिल हो चुकी है। इस प्रकरण में वर्षों बाद कार्रवाई इतनी आगे बढ़ी कि तत्कालीन ईओ (अधिशासी अधिकारी) राजकुमार गुप्ता की गिरफ्तारी तक हो गई। लेकिन इस गिरफ्तारी की कहानी आज से नहीं, बल्कि लगभग छह दशक पहले शुरू होती है।


पहला अध्याय: 1967 का कथित पट्टा


पूरे विवाद की जड़ 12 जुलाई 1967 का वह कथित पट्टा है, जिसके आधार पर सरकारी भूमि पर निजी स्वामित्व का दावा किया गया। बाद में प्रशासनिक जांच में इस पट्टे की वैधता पर गंभीर सवाल उठे। आरोप है कि इसी दस्तावेज़ को आधार बनाकर वर्षों बाद सरकारी भूमि को निजी हाथों में पहुंचाने की योजना बनाई गई।


दूसरा अध्याय: चकबंदी और दावों की शुरुआत


1995 के आसपास गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान सईदुल रहमान ने कथित पट्टे के आधार पर भूमि पर अपना दावा पेश किया। राजस्व अधिकारियों ने दावा स्वीकार नहीं किया, लेकिन मामला न्यायालय तक पहुंच गया। यहीं से विवाद कानूनी लड़ाई में बदल गया।


तीसरा अध्याय: 2008 में खेल तेज हुआ


वर्ष 2008 में नगर पालिका और प्रशासन के सामने यह मामला दोबारा आया। आरोप है कि इसी समय से सरकारी भूमि को निजी संपत्ति बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई।
बताया जाता है कि उस समय के प्रभावशाली लोगों और सत्ता से जुड़े व्यक्तियों का दबाव लगातार बना रहा। जांच एजेंसियों के अनुसार तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी इसी दौर में संदिग्ध मानी गई।


चौथा अध्याय: सत्ताधारियों का प्रभाव


जांच में सामने आया कि उस समय सत्ता के प्रभावशाली नेताओं और स्थानीय राजनीतिक संरक्षण के कारण प्रशासनिक निर्णय प्रभावित हुए।
आरोप है कि तत्कालीन ईओ, पालिका के कुछ अधिकारी तथा अन्य संबंधित लोगों ने सरकारी रिकॉर्ड, न्यायालयी प्रक्रिया और प्रशासनिक कार्रवाई में ऐसी भूमिका निभाई, जिससे सरकारी भूमि पर निजी दावे मजबूत होते चले गए।


पांचवां अध्याय: हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला


नगर पालिका ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कथित पट्टे और भूमि कब्जे को चुनौती दी। लेकिन वर्ष 2013 में तत्कालीन ईओ द्वारा याचिका वापस लेने की कार्रवाई सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई।
आरोप है कि याचिका वापस होते ही सरकारी भूमि पर कब्जे का रास्ता लगभग साफ हो गया और बाद में भूमि का बंटवारा तथा विभिन्न लोगों को कब्जा दिए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई।


छठा अध्याय: करोड़ों की सरकारी जमीन पर निर्माण


आरोपों के अनुसार समय के साथ इस भूमि पर प्लॉट काटे गए, चारदीवारी बनाई गई, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और अन्य निर्माण भी खड़े हो गए। सरकारी संपत्ति धीरे-धीरे निजी उपयोग में आने लगी।
आज भी कई हिस्सों में निर्माण और कब्जे की स्थिति जांच का विषय बनी हुई है।


सातवां अध्याय: सरकार बदली, जांच शुरू हुई


उत्तर प्रदेश में सरकार बदलने के बाद इस पूरे प्रकरण की फाइलें दोबारा खुलीं। प्रशासन ने राजस्व अभिलेख, चकबंदी रिकॉर्ड, न्यायालयी दस्तावेज़ और पालिका की फाइलों की विस्तृत जांच शुरू की।
जांच में कई पुराने निर्णयों, फर्जी दस्तावेजों और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े हुए।


आठवां अध्याय: एसआईटी और एफआईआर


प्रकरण गंभीर होने पर एसआईटी गठित की गई। पुलिस ने विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया और कई लोगों को आरोपी बनाया।
जांच में तत्कालीन अधिकारियों, कर्मचारियों, कथित लाभार्थियों तथा अन्य व्यक्तियों की भूमिका की जांच शुरू हुई।


नौवां अध्याय: मास्टर माइंड कौन?


जांच एजेंसियों का दावा है कि पूरे प्रकरण का सूत्रधार सईदुल रहमान था, जिसने कथित 1967 के पट्टे को आधार बनाकर सरकारी भूमि पर दावा खड़ा किया।
हालांकि यह जांच और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है कि अंतिम रूप से किसकी क्या आपराधिक जिम्मेदारी तय होती है।


दसवां अध्याय: गिरफ्तारी तक पहुंची जांच


जांच आगे बढ़ने पर पुलिस ने तत्कालीन ईओ राजकुमार गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद पर रहते हुए सरकारी हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं की और विवादित याचिका वापस लेने सहित अन्य निर्णयों में संदिग्ध भूमिका निभाई।
पुलिस अन्य आरोपियों की तलाश में भी लगातार दबिश दे रही है। कुछ आरोपी अग्रिम जमानत और अन्य कानूनी राहत के लिए न्यायालय पहुंचे हैं।


अभी कहानी खत्म नहीं हुई


यह मामला केवल 38 बीघा जमीन का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक प्रभाव और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा का भी है।
अब अदालत में यह तय होगा कि कथित फर्जी पट्टा, सरकारी रिकॉर्ड में हुए बदलाव, अधिकारियों की भूमिका और भूमि कब्जे के आरोप किस हद तक सिद्ध होते हैं। यदि आरोप साबित होते हैं तो यह उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी भूमि घोटालों में से एक माना जाएगा।

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