दीपोत्सव: ज्ञान, प्रकाश और समृद्धि संग 14 वर्ष के वनवास के बाद श्रीराम की अयोध्या वापसी का उत्सव

दीपावली, जिसे हम प्रकाश पर्व के रूप में भी जानते हैं, हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। यह पर्व प्रकाश, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक है। दीपावली का महत्व और इतिहास प्राचीन हिंदू ग्रंथों और मिथकों में वर्णित है।

दीपावली पर्व का धार्मिक महत्व हिंदू दर्शन, क्षेत्रीय मिथकों, किंवदंतियों, और मान्यताओं पर निर्भर करता है। प्राचीन हिंदू ग्रन्थ रामायण में बताया गया है कि अनेक लोग दीपावली को १४ साल के वनवास पश्चात भगवान राम व पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण की वापसी के सम्मान के रूप में मानते हैं।


अन्य प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत अनुसार कुछ दीपावली को १२ वर्षों के वनवास एवं एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप में मानते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर आततायी हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व वैद्यराज धन्वंतरि प्रकट हुए थे।

लोग दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ मानते हैं। दीपावली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई लक्ष्मी के जन्म दिवस से शुरू होता है। दीपावली की रात वह दिन है जब लक्ष्मी ने अपने पति के रूप में विष्णु को चुना और फिर उनसे विवाह किया।


भारत के पूर्वी क्षेत्र उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में हिन्दू लक्ष्मी की जगह काली की पूजा करते हैं, और इस त्योहार को काली पूजा कहते हैं। देवी लक्ष्मी के साथ-साथ भक्त बाधाओं को दूर करने के प्रतीक श्रीगणेशजी; संगीत, साहित्य की प्रतीक देवी सरस्वती; और धन प्रबंधक कुबेर को प्रसाद अर्पित करते हैं।

कुछ धर्मावलंबी दीपावली को विष्णु की वैकुण्ठ में वापसी के दिन के रूप में मनाते है। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मीजी प्रसन्न रहती हैं और जो लोग उस दिन उनकी पूजा करते है वे वर्ष के आगामी काल के दौरान मानसिक, शारीरिक दुखों से दूर सुखी रहते हैं।


मथुरा और उत्तर प्रदेश के मध्य क्षेत्रों में इसे भगवान कृष्ण से जुड़ा उत्सव मानते हैं। अन्य क्षेत्रों में, गोवर्धन पूजा (या अन्नकूट) की दावत में श्रीकृष्ण के लिए ५६ या १०८ विभिन्न व्यंजनों का भोग लगाया जाता है और सांझे रूप से स्थानीय समुदाय द्वारा मनाया जाता है।

श्रीकृष्ण भक्तिधारा के अनुयायियों का मत है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीए जलाकर उत्सव मनाया था। जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर, महावीर स्वामी जी को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।


इसी दिन उनके प्रथम शिष्य, गौतम गणधर को ज्ञान प्राप्त हुआ था। जैन समाज द्वारा दीपावली, महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है। महावीर स्वामी (वर्तमान अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर) को इसी दिन (कार्तिक अमावस्या) को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसी दिन संध्याकाल में उनके प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अतः अन्य सम्प्रदायों से जैन दीपावली की पूजन विधि पूर्णतः भिन्न है।

सिक्ख मतावलंबियों के लिए भी दीपावली उत्सव  महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन ही अमृतसर में १५७७ में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और इसके १६१९ में दीपावली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को औरंगजेब की जेल से रिहा किया गया था।


पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म और महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुए थे। उन्होंने दीपावली के शुभदिन गंगातट पर स्नान करते समय ‘ओ३म्’ का उच्चारण करते हुए समाधि ले ली थी। आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट वैचारिक विरोधियों के षडयंत्र के अंतर्गत सेवक जगन्नाथ द्वारा दिए गए काँच मिश्रित दुग्धपान के कारण अवसान लिया था।

आर्थिक गतिविधियों के संदर्भ में दीपावली नेपाल और भारत में सबसे बड़े शॉपिंग सीजन में से एक है; इस दौरान लोग कारें और सोने के गहने आदि महंगी वस्तुएँ तथा स्वयं और अपने परिवारों के लिए कपड़े, उपहार, उपकरण, रसोई के बर्तन आदि खरीदते हैं। यह पर्व नए कपड़े, घर के सामान, उपहार, सोने और अन्य बड़ी ख़रीददारी का समय होता है।

इस त्योहार पर खर्च और ख़रीद को शुभ माना जाता है क्योंकि मान्यता है कि देवी लक्ष्मी धन, समृद्धि, और निवेश की देवी है। दीवाली भारत में सोने और गहने की ख़रीद का सबसे बड़ा अवसर होता है और मिठाई व आतिशबाजी की ख़रीद भी इस दौरान अपने चरम सीमा पर रहती है। प्रत्येक वर्ष दीपावली के दौरान हज़ारों करोड़ रुपए के पटाखों,मिठाइयों, घरेलू सामानों आदि की खपत होती है।

दीपावली का महत्व

दीपावली का महत्व हिंदू धर्म में बहुत अधिक है। यह पर्व भगवान राम की अयोध्या वापसी का उत्सव है, जो १४ वर्ष के वनवास के बाद हुआ था। इसके अलावा, दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मी की पूजा के रूप में भी मनाया जाता है, जो धन और समृद्धि की देवी हैं।

दीपावली का इतिहास

दीपावली का इतिहास प्राचीन हिंदू ग्रंथों में वर्णित है। रामायण के अनुसार, भगवान राम ने रावण का वध किया था और उसके बाद अयोध्या में दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया था। इसके अलावा, महाभारत में भी दीपावली का उल्लेख है, जब पांडव १२ वर्षों के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद घर लौटे थे।

दीपावली की पूजा

दीपावली की पूजा में लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है, जो धन और समृद्धि की देवी हैं। इसके अलावा, भगवान गणेश, सरस्वती और कुबेर की भी पूजा की जाती है। दीपावली की पूजा में दीप जलाना, पूजा करना और उपहार देना शामिल है।

दीपावली का महत्व जैन और सिक्ख धर्म में

दीपावली का महत्व जैन और सिक्ख धर्म में भी है। जैन धर्म में, दीपावली को महावीर स्वामी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है, जबकि सिक्ख धर्म में इसे गुरु हरगोबिंद सिंह जी की रिहाई के रूप में मनाया जाता है।

निष्कर्ष

दीपावली का पर्व प्रकाश, ज्ञान और समृद्धि का प्रतीक है। यह पर्व हमें भगवान राम की अयोध्या वापसी और लक्ष्मी जी की पूजा की याद दिलाता है। दीपावली का महत्व हिंदू धर्म में बहुत अधिक है, और यह पर्व हमें एकता और भाईचारे का संदेश देता है।

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