गीता ज्ञान यज्ञ का भावपूर्ण समापन: स्वामी कृष्णानंद बोले- मैं जा रहा हूं, लेकिन आपके पास श्री कल्कि को छोड़कर जा रहा हूं

लव इंडिया, संभल। हयातनगर में आयोजित सात दिवसीय गीता ज्ञान यज्ञ का समापन भक्तिमय और भावुक वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के अंतिम दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में पूरी तरह लीन दिखाई दिए। भजन-कीर्तन के बीच पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा।


गीता व्यास Swami Krishnanand ने अपने अंतिम उद्बोधन में जीवन, कर्म और धर्म के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मनुष्य का इस संसार में आना निश्चित है, उसी प्रकार उसका जाना भी तय है। व्यक्ति के साथ केवल उसके कर्म और गुण ही जाते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि पिछले सात दिनों में भगवान श्रीकृष्ण की गीता से जो दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है, उसे जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने बुद्धि-विवेक से गीता के संदेशों का पालन करें और समाज में एकता, समानता एवं बंधुत्व स्थापित करने का प्रयास करें।


उन्होंने कहा कि समाज में बिना किसी भेदभाव और प्रतिस्पर्धा के अपने स्वधर्म का पालन करना ही गीता का वास्तविक संदेश है। भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना का जो संदेश दिया, उसका संरक्षण और पालन करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है। कार्यक्रम के दौरान प्रतिक्षा वार्ष्णेय द्वारा गीता ज्ञान आधारित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई। सही उत्तर देने वाले श्रद्धालुओं और कृष्ण भक्तों को गीता पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया गया।

समापन अवसर पर श्रद्धालु भगवान के भजनों पर झूमते और नृत्य करते नजर आए। कार्यक्रम का समापन उत्साह, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ हुआ। अपने भावुक संबोधन में स्वामी कृष्णानंद ने कहा, “मैं तो जा रहा हूँ, लेकिन आपके पास आपके कृष्ण, आपके कल्कि को छोड़कर जा रहा हूँ। उन्हें जानिए और उनके उपदेशों का पालन कीजिए।”

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