रामपुर तिराहा कांड: 32 साल बाद तीन पुलिसकर्मियों को डेढ़-डेढ़ साल की सजा, अदालत ने फर्जी हथियार बरामदगी के दावे को नहीं माना
लव इंडिया, मुजफ्फरनगर। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हुए चर्चित रामपुर तिराहा कांड से जुड़े फर्जी हथियार बरामदगी मामले में मुजफ्फरनगर की विशेष CBI अदालत ने 32 साल बाद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने तत्कालीन तीन पुलिसकर्मियों बृज किशोर, उमेश चंद और अनिल कुमार को दोषी ठहराते हुए डेढ़-डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। फैसला 30 जून 2026 को सुनाया गया।
पुलिस ने दावा किया कि …

यह मामला 1 अक्टूबर 1994 का है, जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी दिल्ली जा रहे थे। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई में कई आंदोलनकारियों की मौत हुई और कई घायल हुए। बाद में पुलिस ने दावा किया कि प्रदर्शनकारियों के पास से अवैध हथियार बरामद हुए थे और उन्हीं हथियारों से पुलिस पर फायरिंग की गई थी।
पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई
मामले की जांच CBI को सौंपी गई। जांच एजेंसी ने अपनी पड़ताल में पाया कि हथियार बरामदगी का पुलिस का दावा विश्वसनीय नहीं था और इस संबंध में अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर माना कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा, जिसके बाद तीनों पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई गई।
CBI ने कितने लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी?

ध्यान देने वाली बात यह है कि रामपुर तिराहा कांड में अलग-अलग एफआईआर और अलग-अलग मुकदमे दर्ज हुए थे। पूरे कांड में CBI ने विभिन्न मामलों में कई पुलिस अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ अलग-अलग चार्जशीट दाखिल की थीं। एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, CBI ने विभिन्न मामलों में 28 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध आरोपपत्र दायर किए थे।
