नाबालिग को भगाने में मदद करना भी पड़ा भारी: दुष्कर्म के दोषी को 12 साल, सहयोगी महिला को 7 साल की सजा
उमेश लव लव इंडिया मुरादाबाद। नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म के नौ साल पुराने मामले में पॉक्सो कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी युवक को 12 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। वहीं, नाबालिग पीड़िता को भगाने और अपराध को अंजाम देने में सहयोग करने वाली महिला को भी सात वर्ष के कारावास से दंडित किया गया। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि अपराध में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले भी कानून की नजर में समान रूप से जवाबदेह हैं।
विशेष न्यायाधीश पॉक्सो कोर्ट-प्रथम रेशमा चौधरी की अदालत ने गुरुवार को सुनाए फैसले में आरोपी लोकेश को अपहरण और दुष्कर्म का दोषी मानते हुए 12 वर्ष के कारावास तथा 35 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। वहीं, पीड़िता को भगाने में मदद करने की आरोपी नीलम को सात वर्ष के कारावास और पांच हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया गया। मामले की तीसरी आरोपी महिला सीमा को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
2017 में दर्ज हुआ था मामला

विशेष लोक अभियोजक मनोज वर्मा और अभिषेक भटनागर के अनुसार कुंदरकी थाना क्षेत्र निवासी वादी ने 18 फरवरी 2017 को अपनी नाबालिग पुत्री के अचानक लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। जांच के दौरान पता चला कि आरोपी लोकेश नाबालिग को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया था।
पुलिस जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि नाबालिग को घर से भगाने और आरोपी की मदद करने में नीलम तथा सीमा की भी भूमिका बताई गई थी। इसके बाद पुलिस ने तीनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया।
पीड़िता के बयान बने अहम साक्ष्य

मुकदमे की सुनवाई के दौरान कुल सात गवाहों के बयान दर्ज किए गए। पीड़िता ने न्यायालय में अपने बयान के दौरान आरोपी लोकेश पर अपहरण और दुष्कर्म के आरोप लगाए। अभियोजन पक्ष ने पीड़िता के बयान, चिकित्सीय साक्ष्य और अन्य दस्तावेजी प्रमाण अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए।
सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने लोकेश और नीलम को दोषी करार दिया। हालांकि तीसरी आरोपी सीमा के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
अदालत का कड़ा संदेश

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने केवल मुख्य आरोपी को ही नहीं, बल्कि अपराध में सहयोग करने वाली महिला को भी कठोर सजा दी है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि नाबालिगों के खिलाफ अपराधों में सहायता, उकसावा या सहयोग करने वाले लोग भी कानून के शिकंजे से नहीं बच सकते।
नौ साल बाद मिला न्याय
करीब नौ वर्षों तक चले इस मुकदमे में आखिरकार अदालत ने दोषियों को सजा सुनाकर पीड़ित परिवार को न्याय दिलाया। पॉक्सो एक्ट के तहत आए इस फैसले को नाबालिगों के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
