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टीएमयू की ई-एफडीपी में फार्मास्युटिकल साइंस के नवाचारों पर मंथन
लव इंडिया मुरादाबाद। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ फार्मेसी की ओर से एड्वान्सिंग एक्सीलेंस इन फार्मास्यूटिकल साइंसेज पर पांच दिनी ऑनलाइन ई-फैकल्टी डवलपमेंट प्रोग्राम ई-एफडीपी में फार्मास्युटिकल विज्ञान में हो रहे नवीनतम शोध, आधुनिक शिक्षण पद्धतियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता- एआई, मशीन लर्निंग, बौद्धिक संपदा अधिकार, अंतर्विषयक अनुसंधान आदि पर गहन मंथन हुआ।
चरक स्कूल ऑफ़ फार्मेसी, मेरठ की प्राचार्या प्रो. वैशाली एम. पाटिल ने अल्जाइमर रोग एवम् बीएसीई-1 अवरोधकों के इन-सिलिको डिजाइन पर बोलते हुए अल्जाइमर रोग के मूल कारणों, रोग की प्रगति और आधुनिक उपचारात्मक रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बीएसीई-1 एंजाइम की भूमिका और इसके अवरोधको के विकास में संगणनात्मक और इन सिलिको तरीकों के महत्व को समझाया। प्रो. पाटिल ने स्टुडेंट्स को ड्रग डिस्कवरी में मॉलिक्यूलर मॉडलिंग, वर्चुअल स्क्रीनिंग और संगणनात्मक उपकरणों के उपयोग की जानकारी देते हुए कहा, इन आधुनिक तकनीकों से न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों के लिए प्रभावी एवम् लक्षित औषधियों के विकास को गति दी जा सकती है।
एमिटी यूनिवर्सिटी, रायपुर के प्राचार्य एवम् निदेशक प्रो. अलंकार श्रीवास्तव ने स्मार्टफोन आधारित औषधि विश्लेषण की आधुनिक तकनीकों का परिचय देते हुए बताया, स्मार्टफोन आधारित विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण, पोर्टेबल, सुविधाजनक और कम लागत वाली औषधि विश्लेषण तकनीक के रूप में उपयोगी साबित हो सकती हैं। उन्होंने स्टुडेंट्स को डिजिटल इमेजिंग, विश्लेषणात्मक अनुप्रयोंगो और आधुनिक सेंसर आधारित दृष्टिकोण के संभावित उपयोगों से अवगत कराते हुए कहा, ऐसी तकनीकें भविष्य में फार्मास्यूटिकल एनालिसिस को अधिक सुलभ, तेज और बहुउपयोगी बनाने में सहायक हो सकती हैं।
गीतम स्कूल ऑफ़ फार्मेसी के फार्मास्यूटिकल केमिस्ट्री विभाग के डॉ. आशीष रंजन द्विवेदी ने न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस तकनीक के सिद्धांत एवम् औषधीय रसायन विज्ञान में इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए बताया, एनएमआर स्पेक्ट्रोस्कोपी से विभिन्न रासायनिक यौगिकों की संरचना, मॉलिक्यूलर परिवेश और फंक्शनल ग्रुप्स की पहचान की जा सकती है। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान एवम् नई दवा संरचनाओं के निर्धारण में एनएमआर की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।
केआईईटी स्कूल ऑफ़ फार्मेसी, केआईईटी ग्रुप ऑफ़ इंस्टिट्यूशंस, गाजियाबाद की प्रो. रोमा घई ने दवाओं की सुरक्षा, प्रभावशीलता और प्रतिकूल औषधि प्रतिक्रियाओं की निगरानी के महत्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया, फार्माकोविजिलेंस से दवाओं से होने वाले प्रतिकूल प्रभावों की पहचान, मूल्यांकन, रोकथाम एवम् रिपोर्टिंग कर मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। फार्माकोविजिलेंस सुरक्षित औषधि उपयोग सुनिश्चित करने के साथ-साथ फार्मेसी स्टुडेंट्स के लिए शोध, उद्योग, क्लिनिकल रिसर्च और नियामक क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी प्रदान कर रहा है।

टीएमयू के रिसर्च एंड डवलपमेंट विभाग के एसोसिएट डीन प्रो. अनुराग वर्मा ने कहा, किसी भी महत्वपूर्ण शोध की शुरुआत सूक्ष्म अवलोकन और जिज्ञासा से होती है। उन्होंने शोध को प्रयोगशाला तक सीमित न रखते हुए उसके परिणामों को समाज, स्वास्थ्य सेवाओं और फार्मास्युटिकल क्षेत्र के लिए उपयोगी बनाने पर जोर दिया।
फार्मेसी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. आशु मित्तल कहा, निरंतर व्यावसायिक विकास ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नवाचार और उत्कृष्ट शोध का आधार है। उन्होंने शिक्षकों से नई तकनीकों और शोध आधारित शिक्षण पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया।
प्रो. मित्तल ने आईवीआईवीसी की अवधारणा एवम् दवा विकास में इसकी उपयोगिता को समझाते हुए दवा विकास, फार्मूला निर्माण, विनिर्धारण और बायो एक़ुइवलेंस अधयननो में आईवीआईवीसी की उपयोगिता के बारे में विस्तार से जानकारी दी। प्रो. फूल चंद्र ने कहा, एक सफल शोध पर्यवेक्षक की भूमिका केवल शोध का मार्गदर्शन करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि शोधार्थियों में वैज्ञानिक सोच, नैतिकता, आलोचनात्मक विश्लेषण और समस्या-समाधान क्षमता विकसित करना भी आवश्यक है।
प्रो. आशीष सिंघई ने फार्मेसी शिक्षा में नवाचारी शिक्षण पद्धतियों, आउटकम आधारित शिक्षा और भविष्य की शैक्षणिक आवश्यकताओं पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने पारंपरिक शिक्षण विधियों के साथ डिजिटल लर्निंग, अनुभवजन्य शिक्षा, परियोजना आधारित शिक्षा और तकनीक सम्मत शिक्षा को अपनाने की आवश्यकता बताई।

डॉ. पुष्पेंद्र कुमार शुक्ला ने हर्बल औषधियों के गुणवत्ता नियंत्रण एवं वैश्विक मानकों पर चर्चा की। प्रो. कृष्ण कुमार शर्मा ने फार्माकोविजिलेंस में कारण-निर्धारण की वैज्ञानिक विधियों पर विस्तृत जानकारी दी। उप-प्राचार्य प्रो. मयूर पोरवाल ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम शिक्षकों की शोध क्षमता, शैक्षणिक गुणवत्ता और व्यावसायिक दक्षता को नई दिशा प्रदान करते हैं। संचालन डॉ. आकाश वर्मा, डॉ. प्रेम शंकर गुप्ता ने किया।
