TMU में प्रो. हरवंश दीक्षित बोले, हमारी सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला मातृभाषा


बहुभाषिक शिक्षा एनईपी की भावना को परिलक्षित करती हैः प्रो. एसके सिंह
प्रतियोगिता में इशू शुक्ला रहे प्रथम, बोले- भाषा हमारी संस्कृति की आत्मा
बंगाली मेरे हृदय की पहली धुनः पायल मैत्री, प्रतियोगिता में दूसरी पोजीशन
थर्ड आए स्टुडेंट कुनाल बौद्ध बोले, भाषा मनुष्य की अंतरात्मा का दर्पण

लव इंडिया मुरादाबाद। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (टीएमयू) के कॉलेज ऑफ लॉ एंड लीगल स्टडीज़ में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर आयोजित भाषण प्रतियोगिता में छात्रों ने विविध भारतीय भाषाओं में अपने विचार प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का उद्देश्य मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करना और बहुभाषिकता के प्रति जागरूकता बढ़ाना रहा।

मातृभाषा से जुड़ी सांस्कृतिक जड़ें: प्रो. हरवंश दीक्षित

लॉ के डीन प्रो. हरवंश दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि जिस भाषा में हम सोचते और महसूस करते हैं, वही हमारे व्यक्तित्व और संस्कारों को आकार देती है। मातृभाषा का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के समान है।

बहुभाषिक शिक्षा और एनईपी की भावना

कॉलेज के प्राचार्य प्रो. एस.के. सिंह ने कहा कि बहुभाषिक शिक्षा नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) की भावना को परिलक्षित करती है। उन्होंने बताया कि बहुभाषिकता विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास को समृद्ध करती है और उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाती है। उन्होंने छात्रों को अपनी मातृभाषा के साथ-साथ अन्य भाषाओं का भी सम्मान करने की प्रेरणा दी।

विविध भाषाओं में छात्रों ने बिखेरी प्रतिभा

प्रतियोगिता में छात्रों ने हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, बंगाली, भोजपुरी, ब्रज भाषा सहित अनेक भाषाओं में भाषण प्रस्तुत किए। हर प्रतिभागी ने अपनी मातृभाषा के महत्व और उससे जुड़े भावनात्मक संबंधों को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया।

प्रथम स्थान: इशू शुक्ला

प्रथम स्थान पर रहे इशू शुक्ला ने बंगाली भाषा में प्रभावशाली वक्तव्य देते हुए कहा कि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति की आत्मा है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा का सम्मान करना अपने अस्तित्व को सम्मान देने जैसा है।

द्वितीय स्थान: पायल मैत्री

द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाली पायल मैत्री ने भी बंगाली भाषा में कहा कि मातृभाषा उनके हृदय की पहली धुन है और उसी में उनकी आत्मा का नूर छुपा है। उनके भावपूर्ण शब्दों ने उपस्थित श्रोताओं को भावुक कर दिया।

तृतीय स्थान: कुनाल बौद्ध

तृतीय स्थान पर रहे कुनाल बौद्ध ने कहा कि भाषा मनुष्य की अंतरात्मा का दर्पण है। शब्दों में उसके विचारों की गरिमा, भावनाओं की कोमलता और संस्कारों की गहराई झलकती है। उन्होंने भाषाई विविधता को भारत की शक्ति बताया।

सांस्कृतिक एकता का संदेश

कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि भारत की भाषाई विविधता उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। मातृभाषा के माध्यम से ही संस्कृति, परंपरा और मूल्यों का संरक्षण संभव है। टीएमयू का यह आयोजन विद्यार्थियों में भाषाई गर्व और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ।

निर्णायक मंडल और संयोजन

प्रतियोगिता का मूल्यांकन डॉ. अमित वर्मा, डॉ. सुशीम शुक्ला और डॉ. कृष्णा मोहन मालवीय ने किया। कार्यक्रम का सफल संयोजन डॉ. नम्रता जैन द्वारा किया गया।कार्यक्रम के अंत में विजेताओं को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए और सभी प्रतिभागियों को मातृभाषा के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प दिलाया गया।

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