अपने समाज के बीच संजय निषाद ने फिर उठाई आरक्षण की आवाज, बोले- अपने घर पर तुरैहा की नेमप्लेट लगाएं, कहा- हक और हिस्सेदारी के लिए लड़ाई जारी रहेगी


उमेश लव, लव इंडिया, मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने मुजफ्फरनगर में अपने समाज के लोगों को संबोधित करते हुए निषाद-तुरैहा, मछुआरा समाज के अधिकारों और आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन को मजबूत करने की कवायद के बीच उनका यह संबोधन राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने संबोधन के दौरान समाज के लोगों से अपने को तुरैहा दर्ज कराने का पाठ पढ़ाया।


मंगलवार को मुरादाबाद में शाहपुर तिगरी रोड पर प्रबुद्ध शैक्षिक युवा मत्स्य पालन संवाद के दौरान संजय निषाद ने निषाद समाज की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने तथा समाज की सामाजिक ऊर्जा को राजनीतिक ताकत में बदलने की अपील की।

अपने ही समाज के मंच से आरक्षण की वकालत


संजय निषाद लंबे समय से निषाद समाज और उससे जुड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किए जाने की मांग करते रहे हैं। उनका तर्क है कि निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप और मझवार जैसी समुदायों की सामाजिक परिस्थितियों और पारंपरिक आजीविका में समानताएं हैं, इसलिए इनके अधिकारों को लेकर अलग-अलग व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। अगस्त 2026 में भी संजय निषाद ने आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा नेतृत्व से तत्काल बातचीत की मांग की थी। उन्होंने कहा था कि समाज की आवाज सुनते हुए इस मामले में जल्द ठोस पहल होनी चाहिए। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा कि निषाद समाज के आरक्षण का सवाल भाजपा से पूछा जाना चाहिए, क्योंकि उनके अनुसार यह भाजपा के पुराने वादों और एजेंडे का हिस्सा रहा है।


आरक्षण की मांग का कानूनी पक्ष भी अहम


निषाद समाज की आरक्षण संबंधी मांग केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका एक संवैधानिक पहलू भी है। हाल में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने का अधिकार अदालत या राज्य सरकार के पास नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत संसद की प्रक्रिया से जुड़ा है।
यही वजह है कि संजय निषाद लगातार केंद्र और भाजपा नेतृत्व पर इस मुद्दे पर फैसला लेने का दबाव बनाते रहे हैं।


‘सामाजिक ऊर्जा को राजनीतिक ऊर्जा में बदलें’


प्रबुद्ध शैक्षिक युवा मत्स्य पालन संवाद में मंत्री ने समाज के लोगों से अपने-अपने मोहल्लों में ‘जय निषाद’ का झंडा लगाने और संगठन को मजबूत करने का आह्वान किया। उनका संदेश साफ तौर पर सामाजिक संगठन को चुनावी राजनीतिक भागीदारी से जोड़ने वाला रहा।
उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निषाद समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने और समाज के लोगों को विधायक बनाने की जरूरत पर जोर दिया। 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए पश्चिमी यूपी में निषाद पार्टी की यह सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी अपने परंपरागत सामाजिक आधार को राजनीतिक रूप से और मजबूत करने की कोशिश कर रही है।


तालाब और मत्स्य पालन को भी अधिकार से जोड़ा


संजय निषाद ने अपने संबोधन में मछुआरा समाज के आर्थिक हितों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने पिछली सरकारों पर मछुआरा समाज की उपेक्षा का आरोप लगाया और तालाबों को मत्स्य पालन के लिए उपलब्ध कराने की बात कही। उनके मुताबिक अब तालाबों को मत्स्य पालन से जोड़ने तथा कश्यप और मछुआरा समाज के लोगों को इसका लाभ दिलाने पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने तालाबों से होने वाली आय को ग्राम पंचायत के विकास में लगाए जाने की बात भी कही।
साथ ही उन्होंने तालाबों पर अवैध कब्जों को हटाने और राजस्व नियमों का पालन सुनिश्चित कराने की बात कही। इन दावों को मंत्री के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।


निषाद-कश्यप समाज को साधने की कोशिश?


संजय निषाद ने निषाद समाज को “मार्शल कौम” और कश्यप समाज को राष्ट्रवादी समाज बताते हुए दोनों समुदायों के ऐतिहासिक योगदान का उल्लेख किया। यह संदेश ऐसे समय आया है जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निषाद-कश्यप समाज की राजनीतिक भागीदारी को लेकर विभिन्न दल सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।


2027 से पहले बढ़ा आरक्षण का सियासी दबाव


संजय निषाद का अपने समाज के बीच आरक्षण की वकालत करना ऐसे समय में सामने आया है जब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। निषाद पार्टी भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन आरक्षण के सवाल पर संजय निषाद लगातार अपनी मांग को सार्वजनिक रूप से उठा रहे हैं। हाल ही में उन्होंने यहां तक कहा कि यदि निषाद समाज की आरक्षण संबंधी मांग पर जल्द फैसला नहीं हुआ तो इसका राजनीतिक असर पड़ सकता है।


इस लिहाज से उनका संबोधन केवल सामाजिक सम्मेलन तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि निषाद-कश्यप समाज को राजनीतिक रूप से लामबंद करने और आरक्षण के मुद्दे को 2027 की राजनीति के केंद्र में बनाए रखने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है।

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