प्राकृत भाषा में रिसर्च की असीम संभावनाएंः प्रो. जय

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र एवम् सेंटर फॉर जैन स्टडीज के संयुक्त तत्वावधान में गोलमेज संवाद

लव इंडिया, मुरादाबाद। बाहुबली प्राकृत विद्यापीठ, कर्नाटक के पूर्व निदेशक प्रो. जय कुमार एन. उपाध्याय बतौर मुख्य वक्ता बोले, प्राकृत भाषा में शोध की अपार सम्भावनाएं हैं। सबसे प्राचीनतम उपलब्ध सामग्री अर्धमागधी, प्राकृत- मध्य-इंडो आर्य भाषा में लिखे गए प्रामाणिक जैन आगमों में निहित है। इन प्रामाणिक ग्रंथों पर जैन मुनियों ने विभिन्न टीकाएं लिखी हैं। बाद में संस्कृत, महाराष्ट्री प्राकृत जैसी अन्य भाषाओं में भी रचनाएं लिखी गईं। इससे पूर्व प्रो. जय कुमार ने गोलमेज संवाद की शुरुआत पंडित रवि शंकर के राग अहिर भैरवी के मंगलाचरण से की। प्रो. जय कुमार तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद की ओर से भारतीय ज्ञान परंपरा में जैन धर्म का योगदान पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह कार्यक्रम टीएमयू के भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र एवम् सेंटर फॉर जैन स्टडीज के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। अंत में मुख्य वक्ता को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। संचालन भारतीय ज्ञान परंपरा- आईकेएस केंद्र की समन्वयक डॉ. अलका अग्रवाल ने किया।

डॉ. उपाध्याय ने प्राकृत भाषा की पहचान, उसकी सभ्यता, संस्कृत से उसका संबंध, भद्रबाहु संहिता, आचार्य कुंदकुंद जैसे प्रमुख जैन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए भारतीय परंपरा में उनकी भूमिका को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने जैन शोधार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए प्राकृत भाषा में उपलब्ध जैन ग्रंथों का संकलन और इस दिशा में चल रहे प्रयासों की वर्तमान स्थिति पर गहनता से चर्चा की। टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन ने यूनिवर्सिटी में भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और प्रसार में जैन दर्शन की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन ने टीएमयू के भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र के महत्व पर प्रकाश डाला। टिमिट-बीटीसी की प्रिंसिपल डॉ. कल्पना जैन ने टीएमयू में जैन अध्ययन की स्थापना की पृष्ठभूमि और इसकी बढ़ती प्रासंगिकता पर अपना सारगर्भित वक्तव्य दिया। कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग की सीनियर फैकल्टी डॉ. रवि जैन ने टीएमयू में जैन ज्ञान परंपरा का विकास पर अपने विचार रखे। चीफ वॉर्डन श्री विपिन कुमार जैन ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। गोलमेज संवाद में 55 जैन शोधार्थियों की भागीदारी रही।

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