लव इंडिया, सम्भल। हयातनगर में दीपा वार्ष्णेय की अध्यक्षता में हो रही गीता ज्ञान यज्ञ के सात दिवसीय कार्यक्रम के छठे दिवस का शुभारंभ भजन-कीर्तन के साथ हुआ। कार्यक्रम में गीता व्यास स्वामी कृष्णानंद झा ने अपने ओजस्वी व्याख्यान में मानव जीवन में बुद्धि, गुण और कर्म के गहरे संबंध को स्पष्ट किया।

स्वामी जी ने बताया कि व्यक्ति की प्रकृति उसकी बुद्धि के अनुसार होती है। मनुष्य जैसी बुद्धि का होता है, उसका आंतरिक स्वरूप भी वैसा ही बन जाता है। व्यक्ति अपनी बुद्धि के अनुरूप ही कर्म करता है और उन्हीं कर्मों के अनुसार सुख-दुख का फल भोगता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बुद्धि की प्रकृति और उसके गुणों को समझना अत्यंत आवश्यक है—यही बुद्धि के विकास का मूल आधार है।
उन्होंने आगे कहा कि सत्व, रज और तम—ये तीनों गुण ही मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। सत्वगुण व्यक्ति को सद्कर्म और धर्म के मार्ग पर प्रेरित करता है, जिससे वह कर्मयोगी बनता है। रजोगुण व्यक्ति को स्वार्थ की ओर ले जाता है, जिससे उसके धर्म-कर्म भी स्वार्थ से प्रेरित हो जाते हैं और वह पाखंड की ओर अग्रसर होता है। वहीं तमोगुण व्यक्ति को प्रमाद और अज्ञान में डाल देता है, जिससे उसका विकास रुक जाता है।

स्वामी जी ने जोर देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं निर्णय करना चाहिए कि वह अपनी बुद्धि का विकास सत्वगुण, रजोगुण या तमोगुण में किस दिशा में करना चाहता है। उन्होंने बताया कि बुद्धि के विकास का सर्वोत्तम साधन स्वाध्याय है। जब व्यक्ति गीता और रामायण जैसे महान ग्रंथों को अपने जीवन में अपनाता है, तभी उसके बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास की वास्तविक शुरुआत होती है।

कार्यक्रम के दौरान कुछ दीदियों ने पिछले पांच दिनों के गीता श्रवण का अपना अनुभव साझा किया, जिससे वातावरण भाव-विभोर हो गया। अंत में भजन-कीर्तन के साथ सभी भक्तों ने भगवान श्रीकृष्ण के उपदेशों का पालन करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने ज्ञान यज्ञ से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया।
