Brahmagyan Vichar seminar: हिन्दू समाज में मूर्तिपूजक, आर्यसमाजी तथा नास्तिक में सामंजस्य

लव इंडिया, मुरादाबाद । अध्यात्म ज्ञान एवं चिन्तन संस्था की 180वीं मासिक ब्रह्मज्ञान विचार गोष्ठी का आयोजन एमआईटी सभागार में किया गया। जिसका विषय था हिन्दू समाज में प्रचलित तीन विचारधाराओं सनातनी मूर्तिपूजक आर्यसमाजी तथा नास्तिक में सामंजस्य के तरीके।

इस विषय का विवेचन करते हुए सुधीर गुप्ता ने बताया कि हमारे हिन्दू समाज में इन तीन विचारधाराओं के कारण कभी-कभी विचार-वैमनस्य उत्पन्न हो जाता है। यह भी हिन्दू समाज में विघटन होने का एक कारण है। सभी विद्वतजन को इन तीनों विचारधाराओं के मानने वालों में सामंजस्य किस प्रकार हो इस पर विचार करना होगा।


नास्तिक विचारधारा के बारे में उन्होने बताया कि नास्तिकवाद में ईश्वर या परलोक की अवधारणा को नहीं माना जाता है। इसके अनुसार संसार में केवल भौतिक तत्व ही वास्तविक हैं और ज्ञान का एकमात्र स्रोत इन्द्रिय अनुभव है। इसको हम चार्वाक दर्शन के नाम से भी जानते है जिसका प्रारम्भ लगभग 600 ईसा पूर्व में हुआ था। इसमें पुनर्जन्म को नहीं माना जाता है।

आर्यसमाज के बारे में सूर्यप्रकाश द्विवेदी ने बताया कि आर्यसमाज महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा सन् 1875 में स्थापित ऐसी संस्था है जिसकी सभी मान्यताएं व उद्देश्य ईश्वरीय ज्ञान ‘वेद’ पर आधारित हैं। इसके अनुसार समस्त विश्व तीन सत्ताओं ईश्वर, जीव एवं प्रकृति का ही प्रसार है। यह पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थक है। आर्यसमाज के अनुसार सबसे प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए तथा सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियमों का पालन करना चाहिए।

रवीन्द्र नाथ कत्याल ने बताया कि सनातन धर्म अनंत काल से चल रहा है और यह एक बहुत खुला धर्म है इसमें कोई रुढ़िवादिता नहीं है। सनातन धर्म के मानने वाले जिस प्रकार भी चाहें अपने जीवन को व्यतीत कर सकते हैं लेकिन उन्हें समाज को साथ लेकर चलना होगा। चाहे वे ईश्वर को माने या न माने, पूजा करें या न करें, फिर भी वे सनातनी रहेंगे। सनातन धर्म में पुनर्जन्म के सिद्धांत को माना जाता है।


इस प्रकार की विवेचना के बाद विभिन्न व्यक्तियों द्वारा तीनों विचारधाराओं में सामंजस्य के सम्बंध में अपने-अपने विचार प्रकट किए गए। अंत में यह निष्कर्ष निकला कि तीनों प्रकार की विचारधाराओं को मानने वाले धर्मगुरुओं तथा विचारकों को एक मंच पर लाना आवश्यक है ताकि सभी व्यक्ति एक-दूसरे की विचारधारा का सम्मान करें तथा समाज के हित में एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करें।


इस विचार गोष्ठी में मान रविन्द्र कत्याल, डॉ.पीके शाह आचार्य धीर शान्त दास, डी० राजेन्द्र प्रसाद वर्मा, डा० अरबिन्द सिन्ध मुत्री सुधा शर्मात्री सूर्य प्रकाश द्विवेदी, हर्ष हर्ष वाधान यादव, रेखा शाह, अनिल सिंह, अनिल सिक्का विवेन्द्र सिंह दीक्षित, अथेन्द्र नाथ सारस्वत आदित
मौजूद थे।

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