गीता ज्ञान यज्ञ का चौथा दिन: समाज में आध्यात्मिक जागरण, नैतिक मूल्यों की स्थापना व कर्मयोग का संदेश मिलता यज्ञ से

लव इंडिया, संभल। गीता ज्ञान यज्ञ के सात दिवसीय आध्यात्मिक कार्यक्रम के चौथे दिवस का शुभारंभ भजन-कीर्तन के साथ अत्यंत भक्तिमय वातावरण में हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से भजन गाकर कार्यक्रम की शुरुआत की, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो गया।

इस अवसर पर गीता व्यास स्वामी कृष्णानंद ने भगवान के विराट स्वरूप का गहन विवेचन करते हुए बताया कि ईश्वर इस संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं और यह सम्पूर्ण जगत उनका ही विराट रूप है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति सृष्टि को ईश्वर का स्वरूप मानकर कर्म करता है, तब वह कर्मयोग के माध्यम से अपने जीवन का वास्तविक कल्याण कर सकता है।

स्वामी जी ने अपने प्रवचन में स्पष्ट किया कि मनुष्य के कर्म ही उसके भाग्य का निर्माण करते हैं। यदि व्यक्ति के कर्म श्रेष्ठ हैं तो उसका भाग्य भी उज्ज्वल होगा, वहीं दूषित कर्म व्यक्ति को पतन की ओर ले जाते हैं। उन्होंने भगवद्गीता के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और स्वयं ही अपना शत्रु होता है। जब व्यक्ति धर्म के अनुसार आचरण करता है, तो वह स्वयं का मित्र बनता है, और जब वह अधर्म या मनमानी करता है, तो वही उसका शत्रु बन जाता है।

आगे स्वामी जी ने भक्ति, ज्ञान और विवेक के आपसी संबंध को समझाते हुए कहा कि भक्ति के माध्यम से भगवान की कृपा प्राप्त होती है, जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है। ज्ञान से विवेक जागृत होता है, और यही विवेक व्यक्ति को धर्ममय आचरण की ओर प्रेरित करता है। इस प्रकार धर्मानुसार जीवन जीते हुए व्यक्ति अंततः भगवान की प्राप्ति करता है।

कार्यक्रम के अंत में भजन-कीर्तन के साथ चौथे दिवस का समापन हुआ, जिसमें सभी श्रद्धालुओं ने भाव-विभोर होकर सहभागिता की।यह गीता ज्ञान यज्ञ समाज में आध्यात्मिक जागरण, नैतिक मूल्यों की स्थापना एवं कर्मयोग के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।

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