प्रतिस्पर्धात्मक एवम् तनावपूर्ण जीवन में कर्म सिद्धांत प्रासंगिक

भारतीय दार्शनिक परिषद की ओर से तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के जैन अध्ययन केंद्र और भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र- आईकेएस के संयुक्त तत्वावधान में जैन कर्म सिद्धांत की समकालीन प्रासंगिकता पर दो दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे जैनोलॉजी के नामचीन मनीषी


जैन दर्शन जीवन प्रबंधन की प्रभावी और वैज्ञानिक प्रणालीः डॉ. फूलचंद जैन

सम्पूर्णानंद संस्कृत यूनिवर्सिटी, वाराणसी के मुख्य अतिथि डॉ. फूलचंद प्रेमी जैन ने जैन दर्शन को जीवन प्रबंधन की प्रभावी और वैज्ञानिक प्रणाली बताते हुए कहा, इसके मूल सिद्धांत- सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान औरं सम्यक चरित्र व्यक्ति को संतुलित, अनुशासित एवम् जिम्मेदार जीवन जीने की दिशा प्रदान करते हैं।

प्रो. रामनाथ झा बोले, कर्म सिद्धांत की सामाजिक समरसता में अहम भूमिका

उन्होंने वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक एवम् तनावपूर्ण जीवन में कर्म सिद्धांत की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा, यह व्यक्ति को अपने प्रत्येक विचार, वाणी और कर्म के प्रति सजग बनाता है। साथ ही अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद सरीखे सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत विकास में सहायक हैं, बल्कि सामाजिक समरसता और सहिष्णुता को भी सुदृढ़ करते हैं।

स्टुडेंट्स कर्मों में शुद्धता, पारदर्शिता और नैतिकता को अपनाएः डॉ. इंदु जैन

उन्होंने स्टुडेंट्स को प्रेरित करते हुए कहा, यदि वे इन सिद्धांतों को अपने जीवन में आत्मसात करें, तो वे न केवल सफल पेशेवर बन सकते हैं, बल्कि एक जिम्मेदार और नैतिक नागरिक के रूप में समाज में सकारात्मक परिवर्तन भी ला सकते हैं। डॉ. प्रेमी केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के भारतीय दार्शनिक परिषद की ओर से तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के जैन अध्ययन केंद्र और भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र- आईकेएस के संयुक्त तत्वावधान में जैन कर्म सिद्धांत की समकालीन प्रासंगिकता पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे।

पूर्व साइंटिस्ट डॉ. राजमल जैन ने कर्म सिद्धांत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ा

इससे पूर्व मुख्य अतिथि डॉ. फूलचंद प्रेमी जैन, जेएनयू के प्रो. रामनाथ झा और एनएमसी, दिल्ली की मेंबर डॉ. इंदु जैन बतौर विशिष्ट अतिथि, इसरो के पूर्व साइंटिस्ट डॉ. राजमल जैन, एलवीएसएसयू नई दिल्ली से प्रो. अनेकांत जैन, टीएमयू के वीसी प्रो. वीके जैन, जैन स्टडीज़ के डायरेक्टर प्रो. विपिन जैन आदि ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलित और मंलगाचरण के संग नेशनल कॉन्फ्रेंस का शुभारम्भ किया।

प्रो. अनेकांत जैन ने घातिया और अघातिया कर्मों का विस्तार से किया उल्लेख

दूसरी ओर द्वितीय सत्र में मगध यूनिवर्सिटी के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. नलिन के. शास्त्री के संग-संग जैनोलॉजी के विद्वान डॉ. श्रेयांस जैन, डॉ. मेधावी जैन, डॉ. वीके जैन आदि ने कर्म सिद्धांत के आध्यात्मिक, सामाजिक एवं व्यावहारिक आयामों पर विस्तार से चर्चा की।

कॉन्फ्रेंस में तीन पुस्तकों- कर्मा थ्योरी इन जैन ट्रेडिशन, इंडियन नॉलेज सिस्टमः एक बहुविषयक दृष्टिकोण और जैन धर्म और सतत विकास लक्ष्य- एसडीजीएसः आधुनिक विश्व के लिए प्राचीन ज्ञान का विमोचन भी हुआ। सभी अतिथियों का बुके देकर स्वागत किया गया। स्मृति चिन्ह भी भेंट किए गए। संचालन भारतीय ज्ञान परम्परा- आईकेएस सेंटर की कोर्डिनेटर डॉ. अलका अग्रवाल ने किया।

टीएमयू के वीसी प्रो. वीके जैन बोले, प्रत्येक कर्म का सीधा संबंध उसके परिणाम से

जेएनयू के प्रो. रामनाथ झा ने बतौर विशिष्ट अतिथि कर्म सिद्धांत को सामाजिक समरसता से जोड़ते हुए कहा, यह सिद्धांत केवल व्यक्तिगत आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में संतुलन, सहयोग और सद्भाव स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण आधार भी है। वर्तमान समय में बढ़ती असहिष्णुता और नैतिक मूल्यों के ह्रास के बीच कर्म सिद्धांत व्यक्ति को आत्मनियंत्रण, सहिष्णुता और नैतिक आचरण की दिशा में प्रेरित करता है, जिससे न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन आता है, बल्कि सामाजिक समरसता को भी मजबूती मिलती है।

नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटीज, नई दिल्ली की डॉ. इंदु जैन ने कहा, जैन दर्शन का कर्म सिद्धांत आज के आधुनिक और जटिल जीवन में अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि यह व्यक्ति को अपने प्रत्येक विचार, वाणी और कर्म के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देता है। वर्तमान समय में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, तनाव और नैतिक मूल्यों के ह्रास के बीच कर्म सिद्धांत एक संतुलित, अनुशासित और जिम्मेदार जीवन जीने का मार्ग प्रदान करता है। यदि व्यक्ति अपने कर्मों में शुद्धता, पारदर्शिता और नैतिकता को अपनाए, तो वह न केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त कर सकता है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

कॉन्फ्रेंस में कर्मा थ्योरी इन जैन ट्रेडिशन के संग-संग दो ई-बुक्स का हुआ विमोचन

उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कर्म की पवित्रता केवल बाहरी आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के आंतरिक विचारों और भावनाओं की शुद्धता से भी जुड़ी होती है, और यही समग्र दृष्टिकोण आज के समय में मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।

इसरो के पूर्व साइंटिस्ट डॉ. राजमल जैन ने कर्म सिद्धांत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हुए इसे ‘कॉस्मिक लॉ’ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि जैसे ब्रह्मांड में प्रत्येक क्रिया का परिणाम निश्चित होता है, उसी प्रकार मानव जीवन में भी प्रत्येक कर्म का प्रभाव पड़ता है।

उन्होंने कर्म को ऊर्जा एवं कंपन के रूप में समझाते हुए इसके दूरगामी प्रभावों पर प्रकाश डाला। एलवीएसएसयू नई दिल्ली से प्रो. अनेकांत जैन ने जैन दर्शन में कर्म की दार्शनिक एवं वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए बताया कि कर्म एक सूक्ष्म द्रव्य के रूप में आत्मा से जुड़कर उसके गुणों को प्रभावित करता है। उन्होंने घातिया और अघातिया कर्मों का उल्लेख करते हुए इसके विभिन्न आयामों को स्पष्ट किया।

जैन स्टडीज़ के डायरेक्टर प्रो. विपिन जैन ने अंत में सभी का किया आभार व्यक्त

वीसी प्रो. वीके जैन ने जैन दर्शन के कर्म सिद्धांत को आधुनिक जीवन की चुनौतियों से जोड़ते हुए कहा, प्रत्येक कर्म का सीधा संबंध उसके परिणाम से होता है। उन्होंने नैतिकता, पारदर्शिता और जिम्मेदारी को जीवन का आधार बनाने पर बल दिया। जैन स्टडीज़ के डायरेक्टर प्रो. विपिन जैन ने सभी अतिथियों का परिचय कराते हुए अंत में आभार व्यक्त किया।

कॉन्फ्रेंस में प्रो. एमपी सिंह, प्रो. नीशीथ मिश्रा, डॉ. अंकिता जैन, डॉ. अमित कंसल, डॉ. ज्योति पुरी, डॉ. वैभव रस्तोगी, डॉ. अनुराग वर्मा, डॉ. करुणा जैन, श्रीमती अहिंसा जैन, डॉ. आशीष जैन, डॉ. विपिन जैन, डॉ. कल्पना जैन, डॉ. विनोद जैन के संग-संग संयोजक डॉ. रत्नेश जैन और सह-संयोजकों में डॉ. नम्रता जैन, डॉ. प्रतिभा शर्मा, डॉ. विभोर जैन, जैनोलॉजी के विद्वान, रिसर्च स्कॉलर्स आदि की उल्लेखनीय मौजूदगी रही।

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