अवैध क्लीनिक को लेकर की गई विभागीय जांच पर अब गंभीर सवाल
मुरादाबाद/अमरोहा। अमरोहा जनपद के जौया क्षेत्र में संचालित कथित अवैध क्लीनिक शिफा क्लीनिक को लेकर की गई विभागीय जांच पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस मामले में अवैध अस्पताल संचालन, कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज, फर्जी डिग्री के प्रयोग और एलोपैथिक दवाओं के उपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे, उस पर तैयार की गई जांच रिपोर्ट केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि रिपोर्ट में अधिकांश मूल आरोपों की सीधी और वैज्ञानिक जांच ही नहीं की गई, जिससे पूरी जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गई है।

शिकायतकर्ता के आरोप
अमरोहा जनपद के थाना डिडौली के ग्राम सिनौरा जलालाबाद निवासी मौ. तौसीफ पुत्र मौ० असलम ने मौ. वसीम एवं मौ. कसीम पुत्रगण शाकिर उर्फ भूरे भूमाफिया एवं सम्पत्ति अर्जित कर रखी है। इन्ही पैसों की खनक के आधार पर यह अपना रौब दिखाते है और कहते है कि हमारा थाने एवं अधिकारियों पर काफी असर है। हमारा किसी से कुछ नहीं बिगड़ेगा। गाँव के लोग इनके डर के आगे इनके खिलाफ जुबान खोलने से भी डरते है। इन दोनों भाईयों का एक अस्पताल शहबाजपुर कलां तहसील सम्भल में चल रहा है। जो मानको के विपरीत बना होने के बाद भी बार-बार सील होता है एवं बार-बार खुल जाता है।
इनका एक क्लीनिक जोया कस्बा में शिफा क्लीनिक के नाम से चल रहा है। जिसमें बसीम कैंसर जैसी गम्भीर बीमारियों का इलाज करता है महोदय से भी मानको के अनुरूप नहीं है।अतः प्रार्थना है कि उपरोक्त दोनों क्लीनिक एवं अस्पतालों को सील करके इनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही करने की कृपा करें एवं इनके द्वारा अर्जित की गयी आय से अधिक सम्पत्ति की जांच कराई जाये एवं बसीम की ग्राम प्रधान पत्नि शबनम द्वारा कराये गये विकास कार्यों की जांच करवाकर घोटालो की रिकवरी कराने एवं इनके द्वारा इसकी कोठी में लगाऐ गये 3 करोड की काली कमाई की जांच कराने एवं उचित कार्यवाही करने की कृपा करें।

मूल आरोपों पर सीधी जांच का अभाव
शिकायत में प्रमुख रूप से यह आरोप लगाए गए थे कि क्लीनिक में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज किया जा रहा है और इसके लिए अवैध तरीके अपनाए जा रहे हैं।
हालांकि जांच रिपोर्ट में केवल यह उल्लेख है कि क्लीनिक पंजीकृत है और यूनानी पद्धति से कार्य कर रहा है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि:
कैंसर उपचार के दावे सही हैं या नहीं
मरीजों के इलाज संबंधी रिकॉर्ड देखे गए या नहीं
प्रिस्क्रिप्शन जब्त कर जांच की गई या नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार इसे अधूरी जांच माना जाएगा।
एलोपैथिक दवाओं की फॉरेंसिक जांच नहीं
रिपोर्ट में कहा गया कि कोई एलोपैथिक दवा नहीं मिली, लेकिन यह नहीं बताया गया कि:
दवा स्टॉक का पंचनामा बनाया गया या नहीं
किसी दवा का सैंपल लैब भेजा गया या नहीं
मेडिकल स्टोर से खरीद-बिक्री के बिलों की जांच की गई या नहीं
कानूनी जानकारों का कहना है कि केवल मौखिक बयान के आधार पर निष्कर्ष निकालना कमजोर प्रक्रिया है।

फर्जी डिग्री के आरोपों पर सत्यापन अधूरा
रिपोर्ट में चिकित्सक के बीयूएमएस (BUMS) होने का उल्लेख है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि:
संबंधित विश्वविद्यालय से सीधे सत्यापन कराया गया या नहीं
एनसीआईएसएम (NCISM) पोर्टल से डिग्री की पुष्टि की गई या नहीं
बिना आधिकारिक सत्यापन के डिग्री को सही मान लेना जांच की बड़ी कमी मानी जा रही है।
मरीजों के बयान तक दर्ज नहीं
यदि क्लीनिक वर्षों से संचालित है, तो अब तक किसी भी मरीज या पीड़ित परिवार का बयान दर्ज न किया जाना जांच की गंभीर खामी माना जा रहा है।

डिजिटल साक्ष्यों की अनदेखी
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि:
क्लीनिक के सीसीटीवी फुटेज देखे गए या नहीं
सोशल मीडिया या डिजिटल प्रचार की जांच हुई या नहीं
जबकि आज के समय में अवैध क्लीनिक अक्सर ऑनलाइन प्रचार करते हैं।
स्वतंत्र जांच की मांग
रिपोर्ट में स्वयं स्वीकार किया गया है कि दोनों पक्षों में आपसी रंजिश है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर ही जांच कर दी गई। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में जिला या मंडल स्तर से स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए।
केवल रजिस्ट्रेशन बताकर मामला समाप्त
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि क्लीनिक का पंजीकरण होना यह साबित नहीं करता कि वहां सभी गतिविधियां वैध हैं। नियमों के उल्लंघन की जांच करना भी आवश्यक था।

कार्रवाई का कोई ठोस प्रस्ताव नहीं
रिपोर्ट के अंत में केवल समय-समय पर निरीक्षण की बात कही गई है, लेकिन:
कोई समय-सीमा तय नहीं
कोई कारण बताओ नोटिस नहीं
कोई चेतावनी या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं

इन अफसरों ने की है यह जांच
इस पूरे मामले की जांच डा० सतीश चन्द्र भास्कर वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी और डा. कुनाल परासर चिकित्सा अधीक्षक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र जोया ने की है।

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