पहले PM पं. जवाहर लाल नेहरू के 10 विवादित फैसले, जो आज भी चर्चा का विषय हैं…

नई दिल्ली। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है।
लेकिन उनके कार्यकाल (1947–1964) के दौरान कई फैसले ऐसे रहे जिनका उस समय कड़ा विरोध हुआ।
फिर भी नेहरू ने उन्हें अपने आदर्शों और दृष्टिकोण के आधार पर लागू किया। यहां पढ़िए उनके 10 सबसे विवादित फैसले, जो आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं।


🟢 1. कश्मीर मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में ले जाना (1948)

नेहरू ने पाकिस्तान के हमले के बाद कश्मीर विवाद को संयुक्त राष्ट्र में उठाने का फैसला किया।
सरदार पटेल सहित कई नेताओं ने इसे राजनयिक भूल बताया।
यह कदम आज भी कश्मीर विवाद की जड़ माना जाता है।


🟢 2. हिंदू कोड बिल का पारित होना (1955–56)

नेहरू ने विवाह, तलाक और संपत्ति अधिकारों में सुधार के लिए हिंदू कोड बिल लागू किया।
रूढ़िवादी समाज ने इसे “संस्कृति विरोधी” कहा,
पर नेहरू ने इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।


🟢 3. समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) पर नरम नीति

संविधान में अनुच्छेद 44 के बावजूद नेहरू ने UCC लागू नहीं किया।
आलोचना हुई कि वे “धर्मनिरपेक्षता में असंतुलन” रख रहे हैं,
लेकिन उनका कहना था — “धर्म की स्वतंत्रता संविधान का मूल है।”


🟢 4. पंचशील समझौता और चीन से दोस्ती (1954)

भारत-चीन “पंचशील समझौता” नेहरू की आदर्शवादी विदेश नीति का प्रतीक बना।
लेकिन 1962 के युद्ध ने इसे भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक भूल में बदल दिया।
“Hindi-Chini Bhai-Bhai” नारा इतिहास बन गया।


🟢 5. गैर-संरेखित आंदोलन (Non-Aligned Movement)

नेहरू ने भारत को अमेरिका या सोवियत संघ के किसी गुट में शामिल नहीं किया।
कुछ ने इसे “दो नावों में पैर रखने” की नीति कहा,
पर यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की नींव साबित हुई।


🟢 6. सार्वजनिक क्षेत्र को प्राथमिकता, निजी उद्योगों पर नियंत्रण

नेहरू ने भारी उद्योगों का सरकारीकरण किया और लाइसेंस-परमिट राज शुरू हुआ।
निजी क्षेत्र ने इसे आर्थिक प्रगति में बाधा कहा,
पर नेहरू का तर्क था — “राज्य को आर्थिक दिशा तय करनी चाहिए।”


🟢 7. गोवा मुक्ति में देरी (1947–1961)

पुर्तगाली शासन से गोवा को आज़ाद कराने में नेहरू ने सैन्य कार्रवाई से परहेज किया।
कई राष्ट्रवादियों ने इसे “कमज़ोर रुख” कहा।
अंततः 1961 में सेना ने कार्रवाई कर गोवा को मुक्त कराया।


🟢 8. भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन (1956)

नेहरू प्रारंभ में इसके विरोध में थे,
लेकिन आंध्र आंदोलन के बाद जनता के दबाव में उन्होंने यह स्वीकार किया।
कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे देश में “भाषाई विभाजन” की शुरुआत कहा।


🟢 9. केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करना (1959)

भारत की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार को नेहरू ने राष्ट्रपति शासन लगाकर हटाया
वामपंथी दलों ने इसे “लोकतंत्र पर हमला” बताया,
हालांकि केंद्र सरकार ने इसे “कानून-व्यवस्था की बहाली” कहा।


🟢 10. चीन युद्ध और रक्षा नीति की विफलता (1962)

चीन के साथ युद्ध में भारत को भारी हार का सामना करना पड़ा।
विपक्ष ने नेहरू पर आरोप लगाया कि उन्होंने “चीन पर अंध विश्वास” रखा और रक्षा तैयारियों की अनदेखी की।
यह हार उनकी प्रतिष्ठा के लिए झटका साबित हुई।


🔍 निष्कर्ष

पंडित नेहरू के फैसले आदर्शवाद और प्रयोगधर्मिता से भरे थे।
कई निर्णयों ने भारत को आधुनिक दिशा दी,
तो कुछ ने देश को कठिन सबक सिखाया।
आज भी उनके फैसले इतिहास और राजनीति दोनों में बहस के विषय बने हुए हैं।


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