ताजमहल सहित देश की कई प्रसिद्ध इमारतें मूल रूप से मुगलों द्वारा निर्मित नहीं: डॉ. पवन जैन

ताजमहल की ‘सच्ची कहानी’ पर विवादास्पद दावा: डॉ. ओक की किताबों से प्रेरित होकर जैन सेवा न्यास अध्यक्ष ने कहा- मुगलों ने भारतीय मंदिरों पर मात्र परतें चढ़ाईं, असली शिल्प हिंदू है

loveindianational, मुरादाबाद: भारत की ऐतिहासिक धरोहरों को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस में एक नया मोड़ आया है। बाबू मुकुट बिहारी लाल जैन सेवा न्यास के अध्यक्ष डॉ. पवन कुमार जैन ने दावा किया है कि ताजमहल सहित देश की कई प्रसिद्ध इमारतें मूल रूप से मुगलों द्वारा निर्मित नहीं हैं, बल्कि ये प्राचीन भारतीय शिल्प की अनुपम कृतियां हैं, जिन्हें मुगलों ने मात्र परतें चढ़ाकर और कुछ तत्व छिपाकर अपना नाम दे दिया।

डॉ. जैन ने अपनी प्रतिक्रिया में प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. पुरुषोत्तम नागेश ओक (पी.एन. ओक) की पुस्तकों का विशेष उल्लेख किया, जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक विरासत पर कई किताबें लिखीं। ओक की किताबें, जैसे “ताजमहल: द ट्रू स्टोरी” और “ताजमहल तेजोमहालय शिव मंदिर है”, ताजमहल को मूल रूप से एक शिव मंदिर-पैलेस बताती हैं, जिसे जयपुर के राजा मानसिंह ने बनवाया था। ओक के अनुसार, शाहजहां ने इसे कब्जा कर मुमताज महल का मकबरा घोषित कर दिया। डॉ. जैन ने कहा, “ओक की हर पुस्तक तथ्यों से भरी हुई है। भारत में मुगलों ने एक भी भवन का निर्माण नहीं किया। चाहे लखनऊ के इमामबाड़े हों, ताजमहल हो, राम मंदिर हो, कृष्ण जन्मभूमि हो, संभल का हरिहर मंदिर हो या ज्ञानवापी मंदिर हो- ये सब भारतीय शिल्प की उत्कृष्ट रचनाएं हैं। मुगलों ने केवल इनके ऊपर परतें चढ़ाईं और कुछ चीजें छिपाईं, फिर इन्हें मस्जिद, इमामबाड़ा या ताजमहल जैसे नाम से प्रचारित किया।”

यह दावा ओक की किताबों, अनेक ग्रंथों, स्थानीय नागरिकों के द्वारा वार्ता, इतिहासविदों एवं पुरातात्विक सर्वेक्षण पर आधारित है, जहां वे 100 से अधिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जैसे ताजमहल की वास्तुकला में हिंदू प्रतीक (जैसे 108 कलश, ‘ओम’ अक्षर और त्रिशूल जैसी संरचनाएं), संगमरमर की जड़ें, और ऐतिहासिक दस्तावेज। ओक ने दावा किया कि ‘ताजमहल’ नाम ‘तेजोमहालय’ (शिव का तेजस्वी महल) का अपभ्रंश है। हालांकि, ओक के सिद्धांतों को मुख्यधारा के इतिहासकार ‘छद्म-विद्वता’ (pseudo-scholarship) मानते हैं और सुप्रीम कोर्ट ने 2000 में उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उनके दावे ‘मस्तिष्क में भ्रम’ पर आधारित हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (एएसआई) ने भी 2017 में स्पष्ट किया कि ताजमहल कभी मंदिर नहीं था।

डॉ. जैन, जो न्यास के माध्यम से शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं, ने इस बयान को “ताज स्टोरी” पर प्रतिक्रिया के रूप में जारी किया। न्यास, जो संभल और मुरादाबाद क्षेत्र में प्रतियोगिताओं और सम्मान समारोहों के लिए जाना जाता है, ने हाल ही में सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं के माध्यम से युवाओं को इतिहास के ‘सच्चे पक्ष’ से अवगत कराने का अभियान चलाया है। डॉ. जैन ने कहा, “ये धरोहरें हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। हमें इनके मूल स्वरूप को समझना चाहिए, न कि विकृत इतिहास को स्वीकार करना।”

यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और विवाद पैदा कर चुका है। कुछ लोग इसे ‘इतिहास के पुनर्लेखन’ की दिशा में सकारात्मक कदम बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रयास मान रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे दावों पर चर्चा तो होनी चाहिए, लेकिन प्रमाण-आधारित शोध ही सच्चाई उजागर कर सकता है। न्यास ने आगे ऐसी जागरूकता अभियानों की घोषणा की है।

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