आत्मा शाश्वत, चेतन और स्वतंत्र सत्ताः डॉ. दिनेश चंद्र शास्त्री

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी में जैन दर्शन के कर्म सिद्धांत पर गहन मंथन, जैन मनीषियों ने विविध आयामों को किया स्पष्ट, वैलिडिक्टरी सत्र में रिसर्च स्कॉलर्स को दिए गए प्रमाण पत्र

लव इंडिया, मुरादाबाद। उत्तराखंड संस्कृति यूनिवर्सिटी-हरिद्वार के पूर्व कुलपति डॉ. दिनेश चंद्र शास्त्री ने जैन दर्शन के मूल तत्व- आत्मा और कर्म को गहराई से स्पष्ट करते हुए बताया, आत्मा एक शाश्वत, चेतन और स्वतंत्र सत्ता है। आत्मा अपनी वास्तविक प्रकृति को इसलिए नहीं पहचान पाती, क्योंकि उस पर कर्मों का सूक्ष्म आवरण चढ़ जाता है।


कर्म सिद्धांत और पंच नमस्कार मंत्र जैन परंपरा का आधारः प्रो. राका जैन

उन्होंने कर्म को केवल एक दार्शनिक अवधारणा न मानकर एक सूक्ष्म भौतिक तत्व के रूप में व्याख्यायित किया, जो व्यक्ति के विचार, वाणी और क्रिया के जरिए आत्मा से जुड़ता है। उन्होंने कषायों- राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया एवं लोभ को कर्म बंधन का प्रमुख कारण बताया।

उन्होंने स्पष्ट किया, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के त्रिवेणी संगम से आत्मा कर्मों से मुक्त हो सकती है। डॉ. शास्त्री भारतीय दार्शनिक परिषद की ओर से तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के जैन अध्ययन केंद्र और भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र-आईकेएस के संयुक्त तत्वावधान में जैन कर्म सिद्धांत की समकालीन प्रासंगिकता पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे।


डॉ. करुणा जैन का द्रव्य और भाव कर्म के पारस्परिक संबंधों पर व्याख्यान

इससे पूर्व पूर्व कुलपति डॉ. दिनेश चंद्र शास्त्री, बीएल इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, नई दिल्ली की प्रो. राका जैन, डॉ. राजमल जैन, डॉ. जय कुमार जैन, डॉ. पुनीत जैन, टीएमयू के वीसी प्रो. वीके जैन, जैन स्टडीज़ के डायरेक्टर प्रो. विपिन जैन, डॉ. करुणा जैन आदि ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलित करके कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। इस मौके पर टीएमयू आईकेएस सेंटर की कोर्डिनेटर डॉ. अलका अग्रवाल, श्रीमती अहिंसा जैन की उल्लेखनीय मौजूदगी रही।

वैलिडिक्टरी सत्र में टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम स्टुडेंट्स के बौद्धिक एवं नैतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरण किए गए। समापन राष्ट्रगान के संग हुआ। संचालन डॉ. प्रतिभा शर्मा और डॉ. नम्रता जैन ने किया। कॉन्फ्रेंस के संयोजक डॉ. रत्नेश जैन ने वोट ऑफ थैंक्स दिया।


प्रत्येक विचार और कर्म का परिणाम तयः सॉफ्टवेयर इंजीनियर डॉ. पुनीत

बीएल इंस्टिट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, नई दिल्ली की प्रो. राका जैन ने जैन दर्शन के कर्म सिद्धांत और पंच नमस्कार मंत्र को जैन परंपरा का आधार बताते हुए पंच परमेष्ठी- अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कर्मों के वर्गीकरण को विस्तार से समझाते कहा, घातिया कर्म ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय आत्मा के मूल गुणों को बाधित करते हैं, जबकि अघातिया कर्म- नाम, गोत्र, आयु और वेदनीय जीव के बाह्य अस्तित्व से संबंधित होते हैं। कर्म बंध सिद्धांत पर बोलते हुए उन्होंने कषायों को कर्म बंधन का मूल कारण और संयम, साधना और आत्म-अनुशासन को मुक्ति का साधन बताया।


मानव जीवन में भी प्रत्येक कर्म ऊर्जा के रूप में संरक्षितः डॉ. राजमल जैन

गुनवृत फाउंडेशन- गुजरात की डायरेक्टर डॉ. करुणा जैन ने द्रव्य कर्म और भाव कर्म के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करते हुए बताया, द्रव्य कर्म सूक्ष्म भौतिक कण होते हैं, जबकि भाव कर्म व्यक्ति के आंतरिक विचार, भावनाएं और मानसिक अवस्थाएं होती हैं। ये दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते है। उन्होंने उन्होंने कर्म सिद्धांत को दैनिक जीवन से जोड़ते हुए बताया, व्यक्ति अपने विचारों को नियंत्रित करके अपने जीवन की दिशा बदल सकता है।

एंटेन, हैदराबाद के सॉफ्टवेयर डवलपमेंट इंजीनियर डॉ. पुनीत जैन ने कर्म सिद्धांत को कॉज एंड इफेक्ट सिस्टम से समझाते हुए कहा कि जैसे कंप्यूटर में प्रत्येक इनपुट का एक निश्चित आउटपुट होता है, वैसे ही मानव जीवन में प्रत्येक विचार और कर्म का निश्चित परिणाम होता है। उन्होंने ‘माइंड मैनेजमेंट’ और ‘इमोशनल कंट्रोल’ को कर्म बंधन से मुक्ति का आधुनिक उपाय बताया।


डॉ. जय कुमार जैन बोले, सफलता को आत्म-अनुशासन, समय प्रबंधन जरूरी

इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. राजमल जैन ने जैन दर्शन को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए कहा, कर्म सिद्धांत को ऊर्जा और कणों के सिद्धांत के माध्यम से भी समझा जा सकता है। जैसे ब्रह्मांड में प्रत्येक क्रिया का प्रभाव होता है, वैसे ही मानव जीवन में भी प्रत्येक कर्म ऊर्जा के रूप में संरक्षित रहता है। उन्होंने जैन दर्शन को स्प्रिचुअल साइंस बताते हुए कहा, यह केवल आस्था नहीं, बल्कि एक तर्कसंगत और अनुभवजन्य प्रणाली है।

जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनू के प्रो. जय कुमार जैन ने जैन दर्शन को शिक्षा और व्यक्तित्व विकास से जोड़ते हुए बताया, यह दर्शन केवल मोक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन को व्यवस्थित और संतुलित बनाने की कला भी सिखाता है।


डॉ. अर्चना जैन ने तत्त्वार्थ सूत्र के संदर्भ में प्रभावशाली ढंग से किया प्रस्तुत

उन्होंने स्टुडेंट्स को संबोधित करते हुए कहा, आत्म-अनुशासन, समय प्रबंधन और नैतिक मूल्यों का पालन ही वास्तविक सफलता का आधार है। टीएमयू की डॉ. अर्चना जैन ने जैन दर्शन के दार्शनिक आधार को तत्त्वार्थ सूत्र के संदर्भ में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

उन्होंने आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा को सात तत्वों- जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष के जरिए स्पष्ट किया। उन्होंने बताया, जब जीव में कषाय उत्पन्न होते हैं, तो आस्रव के माध्यम से कर्मों का प्रवाह आत्मा की ओर होता है और बंध की अवस्था में वे आत्मा से जुड़ जाते हैं। संवर के माध्यम से नए कर्मों के प्रवेश को रोका जा सकता है, जबकि निर्जरा के माध्यम से पुराने कर्मों का क्षय होता है।

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