अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग में भारत को लेकर उठे सवाल, सोशल मीडिया पोस्ट के बाद छिड़ी बहस

नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया गया है कि कश्मीरी मूल के एक्टिविस्ट और “हिंदुत्व वॉच” से जुड़े रकीब हमीद नाइक ने अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) में भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। वायरल पोस्ट में कहा गया कि उन्होंने CAA, NRC और SIR को मुसलमानों के अधिकारों पर असर डालने वाली “त्रयी” बताया और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने की मांग की।


सोशल मीडिया पर इस पोस्ट के वायरल होने के बाद इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई। कई यूजर्स ने पोस्ट को भारत विरोधी बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी, जबकि कुछ लोगों ने इसे मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की कोशिश बताया।


फैक्ट चेक में क्या सामने आया?


तथ्यों की जांच में यह स्पष्ट हुआ कि रकीब हमीद नाइक वास्तविक व्यक्ति हैं और वे “Hindutva Watch” तथा “India Hate Lab” जैसे प्लेटफॉर्म से जुड़े रहे हैं। वे पहले भी भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी राय रखते रहे हैं।
हालांकि वायरल पोस्ट में किए गए सभी दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अभी तक अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) की ओर से ऐसा कोई सार्वजनिक आधिकारिक दस्तावेज सामने नहीं आया है, जिसमें ठीक उसी भाषा में RSS पर प्रतिबंध लगाने या “CAA-NRC-SIR त्रयी” जैसे शब्द दर्ज हों।
विशेषज्ञों का कहना है कि CAA और NRC को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले भी चर्चाएं और आलोचनाएं होती रही हैं। USCIRF ने वर्ष 2019 और 2020 में भारत के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और NRC को लेकर चिंता व्यक्त की थी। लेकिन वायरल पोस्ट में कई दावों को बढ़ा-चढ़ाकर और राजनीतिक संदर्भों के साथ पेश किया गया प्रतीत होता है।


पुरानी बहस को नए संदर्भ में किया जा रहा वायरल


फैक्ट चेक के अनुसार सोशल मीडिया पर वायरल हो रही सामग्री कोई ताजा आधिकारिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि पुरानी चर्चाओं, मानवाधिकार रिपोर्टों और हालिया राजनीतिक टिप्पणियों को मिलाकर नए तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली राजनीतिक और धार्मिक संवेदनशील पोस्टों को बिना सत्यापन के साझा करने से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।

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