तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ एलाइड एंड हैल्थ केयर साइंसेज की ओर से फ्यूचर ऑफ इन्नोवेशन एंड साइंस एंड टेक्नोलॉजी- एफआईएसटी थीम पर इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस- हैल्थ फॉरेंसिक- 2026 का समापन

यूनिवर्सिटी ऑफ फिलिपिंस- मनीला के कॉलेज ऑफ आर्ट एंड साइंसेज़ की डीन डॉ. मा. टेरेसा गुआजोन डी गुज़मान ने बिहेवियरल इकोलॉजीज ऑफ डेथः हेरिटेज फॉरेंसिक्स एंड ह्यूमैनिटेरियन फॉरेंसिक्स इन आर्किपेलैजिक सोसाइटीज पर बोलते हुए कहा, फॉरेंसिक साइंस केवल क्राइम सॉल्विंग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि डेथ हेरिटेज और बिहेवियरल इकोसिस्टम को समझने में भी सहायक है। हेरिटेज फॉरेंसिक कल्चर और साइंस के बीच एक सेतु का काम कर रही है। बरसों पुराने मृत अवशेषों के अध्ययन से यह पता लगाया जा सकता कि उस समय उन लोगों के रीति-रिवाज क्या रहे होंगे? साथ ही फॉरेंसिक विज्ञान वैज्ञानिक पहचान बनाने और कानूनी उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रो. ओपी जसूजा बोले, थ्री-डी फॉरेंसिक फेशियल रिकंस्ट्रक्शन तकनीक बहुउपयोगी
डॉ. मा. टेरेसा तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एलाइड एंड हैल्थ केयर साइंसेज की ओर से फ्यूचर ऑफ इन्नोवेशन एंड साइंस एंड टेक्नोलॉजी- एफआईएसटी थीम पर आयोजित दो दिनी इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस- हैल्थ फॉरेंसिक- 2026 के समापन मौके पर बतौर की नोट स्पीकर ऑनलाइन बोल रहीं थीं। इससे पूर्व आरआईएमटी- पंजाब के प्रो. ओपी जसूजा, आईआईटी-रूड़की के डॉ. राजेश कुमार, स्वामी रामा हिमालयन यूनिवर्सिटी-देहरादून के सीनियर एमआरआई टेक्नोलॉजिस्ट श्री अनंत राम उनियाल, कॉलेज ऑफ एलाइड एंड हैल्थकेयर साइंसेज के प्रिंसिपल एंड कॉन्फ्रेंस चेयरपर्सन प्रो. नवनीत कुमार, एचओडीज़- डॉ. रूचि कांत, श्री रवि कुमार, श्री अमित बिष्ट आदि ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलित करकेे कार्यक्रम का शुभारम्भ किया।

एंटीबॉडी बेस्ड थेरेपी ब्रेस्ट और लंग कैंसर इलाज में प्रभावी विकल्पः डॉ. राजेश कुमार
एचओडी डॉ. रूचि कांत ने कॉन्फ्रेंस समरी प्रस्तुत की। सभी अतिथियों का बुके देकर स्वागत किया। अंत में सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह और सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया गया। दूसरी ओर वेलिडिक्ट्री सत्र में बेस्ट- ओरल रिसर्च पेपर्स, पोस्टर्स प्रेजेंट और थीसिस के विजेताओं को पुरस्कृत भी किया गया। फॉरेंसिक विभाग के स्टुडेंटस् की 06 टीमों- द ऐविडेंस इनिगमास, फॉरेंसिक फैल्कॉन्स, द क्राइम सीन स्लूथस, ट्रेस टाइटंस, द साइलेंट विटनेस और द एनालिटिकल ऐसेस ने क्राइम सीन इन्वेस्टिगेशन भी किया। पैरामेडिकल के स्टुडेंट्स ने कॉन्फ्रेंस के दौरान कल्चरल प्रस्तुतियां भी दीं। संचालन फैकल्टी श्रीमती सौम्या त्रिपाठी ने किया।

आधुनिक इमेजिंग तकनीकों की सटीक निदान में महत्वपूर्ण भूमिकाः एआर उनियाल
आरआईएमटी- पंजाब के प्रो. ओपी जसूजा ने 3-डी फॉरेंसिक फेशियल रिकंस्ट्रक्शन पर बोलते हुए कहा, 3-डी फॉरेंसिक फेशियल रिकंस्ट्रक्शन तकनीक से किसी भी स्कल्स को पहचान दी जा सकती है। इस तकनीक के जरिए ऐसे व्यक्ति जिनके की फोटो या फिंगर प्रिंट हमारे पास नहीं हैं, उनकी पहचान बनाई जा सकती है। फॉरेंसिक फेशियल एप्रॉक्सिमेशन तकनीक से केवल कंकाल के आधार पर भी व्यक्ति की पहचान संभव हो पाती है। कानूनी मामलों में रिकंस्ट्रक्ड इमेज़ मीडिया और जांच एजेंसियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती हैं, जो पहचान और जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं।

बेस्ट- ओरल रिसर्च पेपर्स, पोस्टर्स प्रेजेंट और थीसिस के विजेता भी हुए पुरस्कृत
आईआईटी-रूड़की के डॉ. राजेश कुमार ने एंटीबॉडी बेस्ड थेराप्यूटिक इंटरवेंशन अगेन्स्ट वायरल एंड नॉन वायरल एंटीजंस पर बोलते हुए कहा, एंटीबॉडी आधारित थेरेपी ब्रेस्ट और लंग कैंसर के इलाज में एक प्रभावी विकल्प बनकर उभर रही है। उन्होंने बताया कि आईआईटी रूड़की में बैंबू शार्क और ऊंट की एंटीबॉडीज़ पर शोध चल रहा है। यह शोध कैंसर इलाज को अधिक प्रभावी और सुरक्षित बना सकता है। भविष्य में कैंसर के इलाज के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है और मरीजों के लिए अधिक सुरक्षित एवम् प्रभावी उपचार विकल्प उपलब्ध करा सकता है। बैंबू शार्क और ऊंट की एंटीबॉडीज़ संरचनात्मक रूप से अलग और अधिक स्थिर होती हैं, जिससे वे कैंसर कोशिकाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लक्ष्य बना सकती हैं।

फॉरेंसिक विभाग के स्टुडेंट्स की आधा दर्जन टीमों ने क्राइम सीन किया इंवेस्टिगेट
स्वामी रामा हिमालयन यूनिवर्सिटी-देहरादून के सीनियर एमआरआई टेक्नोलॉजिस्ट श्री अनंत राम उनियाल प्रिकॉशंस इन इमेजिंग एज एविडेंस पर चर्चा करते हुए चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग होने वाली इमेजिंग तकनीकों के सही, सुरक्षित और प्रमाण-आधारित उपयोग पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया, आधुनिक इमेजिंग तकनीकें जैसे एक्स-रे, सीटी स्कैन और एमआरआई रोगों के सटीक निदान में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मरीज को अनावश्यक रेडिएशन के जोखिम से बचाना जरूरी है। साथ ही हर निर्णय वैज्ञानिक प्रमाण पर आधारित होना चाहिए।

श्री उनियाल बोले, सही प्रोटोकॉल, प्रशिक्षित तकनीशियन और उचित व्याख्या इमेजिंग की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं। उन्होंने कहा, जिम्मेदार और प्रमाण-आधारित इमेजिंग उपयोग से न केवल रोगों का सही निदान संभव है, बल्कि मरीज की सुरक्षा और उपचार की सफलता भी सुनिश्चित की जा सकती है।
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