बांग्लादेश में संवैधानिक सुधार पर टकराव: BNP ने ‘कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल’ में शपथ लेने से किया इनकार

बांग्लादेश में संवैधानिक सुधार की दिशा में उठाया गया यह कदम राजनीतिक विवाद का कारण बन गया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी द्वारा परिषद में शपथ से इनकार ने स्पष्ट कर दिया है कि सुधार प्रक्रिया आसान नहीं होगी। आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर व्यापक राजनीतिक बहस की संभावना है।


बांग्लादेश की राजनीति में संवैधानिक बदलाव को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रमुख विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने अंतरिम सरकार के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है, जिसमें नव-निर्वाचित सांसदों (MPs) को एक नई “कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल” के सदस्य के तौर पर एक साथ शपथ लेने के लिए कहा गया था। यह काउंसिल संसद चुनावों के साथ हुए जनमत-संग्रह (रेफरेंडम) के आधार पर संविधान में संशोधन का खाका तैयार करने के लिए प्रस्तावित बताई जा रही है।


क्या है ‘कॉन्स्टिट्यूशन रिफॉर्म काउंसिल’ का प्रस्ताव?


अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं, ने सुझाव दिया कि नए MPs संसद की शपथ के साथ-साथ एक अलग परिषद के सदस्य के रूप में भी शपथ लें।
बताया गया कि इस परिषद का उद्देश्य: चुनावों के साथ हुए जनमत-संग्रह के परिणामों का विधायी अनुवाद, संविधान में संभावित संरचनात्मक बदलावों पर सिफारिश और राजनीतिक सहमति से सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। सरकार का तर्क है कि इससे सुधार प्रक्रिया “संस्थागत” और “समावेशी” बनेगी।

BNP का रुख: ‘पहले संसद में बहस’


शपथ समारोह से ठीक पहले BNP के वरिष्ठ नेता सलाहुद्दीन अहमद ने पार्टी प्रमुख तारिक रहमान की मौजूदगी में घोषणा की कि पार्टी इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगी।
BNP का कहना है: प्रस्तावित परिषद के नियम वर्तमान संविधान का हिस्सा नहीं हैं। इस तरह की व्यवस्था पर पहले संसद में व्यापक चर्चा और विधायी प्रक्रिया जरूरी है। MPs का प्राथमिक दायित्व संसद के सदस्य के रूप में शपथ लेना है, न कि किसी नई असंवैधानिक संरचना का हिस्सा बनना।
इसी के चलते BNP के सांसदों ने केवल संसद सदस्य के रूप में शपथ ली और परिषद से दूरी बनाए रखी।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और संभावित असर


बांग्लादेश में लंबे समय से चुनावी सुधार, सत्ता-संतुलन और संवैधानिक ढांचे पर बहस चलती रही है। ऐसे में अंतरिम सरकार द्वारा समानांतर परिषद की अवधारणा ने नई राजनीतिक रेखाएं खींच दी हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक: यह टकराव संसद और अंतरिम कार्यपालिका के बीच अधिकार-सीमा का सवाल बन सकता है। सुधार प्रक्रिया में देरी या राजनीतिक ध्रुवीकरण की आशंका है। यदि संसद में सहमति नहीं बनी, तो रेफरेंडम-आधारित बदलावों की वैधानिकता पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।
सरकार की दलील बनाम विपक्ष की आपत्ति

सरकार का पक्ष:


जनमत-संग्रह जनता की इच्छा का प्रतिबिंब है।
सुधार परिषद एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है, जो प्रक्रिया को तेज करेगी।

BNP की आपत्ति:


संवैधानिक संशोधन का एकमात्र मंच संसद है।
किसी नई परिषद का गठन पहले विधायी मंजूरी से गुजरना चाहिए।

आगे क्या?


अब निगाहें संसद की कार्यवाही और संभावित विधेयक पर टिकी हैं। यदि सरकार परिषद को कानूनी आधार देने के लिए बिल लाती है, तो बहस और तीखी हो सकती है। दूसरी ओर, विपक्ष के सख्त रुख से व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण होगा।


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